श्रावणी मेला 2020 – विश्व प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम श्रावणी मेले का महत्व

श्रावणी मेले का नाम सुनते ही हमें बाबा वैद्यनाथ धाम की याद आती है। श्रावण आते ही बाबा नगरी देवघर में काँवरियों की हर-हर महादेव और बोल-बम जैसे भक्तिमय शब्द गूंजने लगते है। श्रावण मेला शिव जी की भक्ति और अराधना का प्रतीक है। आज हमलोग देवघर स्थित बाबा नगरी में आयोजन होने वाले श्रावणी मेले के बारे में जानेंगे।

श्रावणी मेला – एक परिचय

विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले का इतिहास विश्व भर में प्रसिद्ध है। पूरे वर्ष में लोग श्रावणी मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। लाखों श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष वैद्यनाथ धाम में महादेव को जल चढ़ाने के लिए आते हैं। देवघर में स्थित शिवलिंग का अपना खास महत्व है। इसे मनोकामना लिंग के नाम से भी जाना जाता है। यह देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।

Babadham Deoghar Sharawan Mela 2020 श्रावणी मेला
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श्रावण में कांवरिया सुल्तानगंज से पवित्र गंगाजल भरकर 105 किलोमीटर की कठिन पदयात्रा कर बाबा भोलेनाथ पर जलाभिषेक करते हैं। जिससे बाबा वैद्यनाथ प्रसन्न होकर सभी की मनोकामना पूर्ण करते हैं। महादेव के सभी भक्त शिवजी को जल चढ़ाने के साथ-साथ फूल-बेलपत्र भी चढ़ाते है।

श्रावण मेला कब मनाया जाता है

विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला बाबाधाम देवघर में प्रत्येक साल बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सावन माह में मनाया जाने वाला यह मेला किसी महाकुंभ से कम नहीं है। ऐसा माना जाता है कि श्रावण का महीना भगवान महादेव के लिए शुभ है। यही कारण है कि श्रावणी मेला श्रावण महीने में मनाया जाता है।

हिंदी पंचांग के अनुसार श्रावणी मेला गुरु पूर्णिमा से शुरू होता है। जो अगले श्रावण पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन तक रहता है। एक माह तक चलने वाली देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम का श्रावणी मेला पूरे संसार में प्रसिद्ध है।

श्रावणी मेला कैसे मनाया जाता है

इस मेले में महादेव की पूजा एवं जलाभिषेक के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। श्रावणी मेले की तैयारी एक-दो महीने पहले से ही शुरू हो जाती है। श्रमिकों द्वारा हजारों बांस लाए जाते हैं, जिससे काँवर बनाया जाता है। श्रावणी मेले में काँवर का विशेष महत्व है। इन कांवरों को बहुत ही आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। रंग-बिरंगे कपड़े, कलश, झल्ले, घंटी, आदि उसमें प्रयोग में लाते हैं। काँवरिये इन्ही काँवरों को लेकर बाबा को जल चढ़ाने आते है।

हर तरफ बोल बम और हर-हर महादेव ही सुनाई पड़ते है। भक्ति और श्रद्धा का सबसे बड़ा मेला बोल-बम श्रावणी मेले में देखने को मिलता है। बहुत बड़ी मात्रा में मेला भी लगता है। विभिन्न प्रकार की दुकाने वैधनाथ धाम में देखने को मिलता है। बाबा वैद्यनाथ सहित सभी मंदिरों को सुंदर ढंग से सजाया जाता है। कांवरिया पथों को प्रशासन द्वारा विशेष सफाई कराई जाती है। पूरे शहर के लोग उत्साहित रहते हैं। विभिन्न संस्थानों द्वारा कांवरियों की निशुल्क सेवा की जाती है। लोग हर तरह से कांवरियों की सेवा करते हैं। उदाहरण स्वरूप कोई कांवरियों को भोजन कराते हैं, तो कोई सरबत, पानी, चाय, आदि द्वारा सेवा करते हैं। कांवरियों की शारीरिक सेवा के साथ-साथ निशुल्क चिकित्सा भी की जाती है। कांवरियों को किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होता है। यहाँ उन्हें रास्तों पर तरह-तरह की सुविधाएं मिलती है।

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श्रावणी मेला के दौरान हजारों की संख्या में जवानों की नियुक्ति की जाती है। जिससे कांवरियों को किसी प्रकार की असुविधा ना हो। हजारों हजार टेंट लगाया जाता है। कांवरियों के विश्राम एवं मनोरंजन हेतु हर जगह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है।

श्रावणी मेला का धार्मिक महत्व

बारह महीनों में श्रावण का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। कोई भी प्राणी श्रावण मास में मन कर्म और वचन को शुद्ध रखते हुए, यदि एक माह तक शिव आराधना करें, तो वह मोक्ष की प्राप्ति के योग्य है (महर्षि वेदव्यास के शास्त्रानुसार)

श्रावण में भगवान शिव की पूजन का विशेष महत्व होता है। श्रावण के सोमवार को देश की हर शिवालयों में आपको काफी भीड़ देखने को मिल जाएगी। क्योंकि श्रावण माह में ही शिव को जलाभिषेक द्वारा जल्द प्रसन्न कराने का फल मिलता है। शिव को कुछ नहीं चाहिए, वह तो बस भक्ति के प्यासे हैं। लोग जिस तरह उसकी भक्ति करते हैं, उसी से वे प्रसन्न होकर उन्हें मनोवांछित वर देते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु चतुर्मास शयन निद्रा में चले जाते हैं। तो भगवान शिव ही जगत के पालन का उत्तरदायित्व संभालते हैं। तब देवी देवता यक्ष राक्षस सभी श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने आते हैं, “श्रावणे च शांत शिव” अर्थात श्रावण मास में शिव किसी भी प्रकार से क्रोध नहीं करते हैं। वैसे तो वह जब भी क्रोधित होते हैं, संपूर्ण ब्रह्मांड काँपने लगता है। परंतु श्रावण में वह शांत भाव से भक्ति की पूजा स्वीकार करते हैं। वह भक्ति में लीन हो जाते हैं, जल बेलपत्र बस इसी से वे प्रसन्न हो जाते हैं। हमारे भोलेनाथ अर्थात भगवान शिव जिसे संपूर्ण जगत देवों के देव महादेव के नाम से भी जाना जाता है, उन्हें हम कोटि कोटि प्रणाम करते हैं।

श्रावण मेला क्यों मनाया जाता है

भारत में वर्ष भर विभिन्न प्रकार का त्योहार मनाया जाता है। लेकिन श्रावण शिव जी का महीना है और यह शिव को ही समर्पित है। सावन का महीना भगवान शिव के लिए शुभ माना जाता है। प्राणियों के कष्ट निवारण, दुखनाश,  आपदा से रक्षा, निसंतान, कालसर्पाे से मुक्ति हेतु श्रावणी मेला मुख्य रूप से मनाया जाता है।

शिव जी को जल क्यों चढ़ाया जाता है

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवता और दानव समुद्र की गर्भ में छिपे दिव्य रत्नों को प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन का विचार किया। इसके लिए वह अंत तक समुद्र मंथन करने के लिए समुद्र के मध्य आए। सुमेरु पर्वत और वासुकी नाग की सहायता से वे समुद्र मंथन करने लगे। जिसमें 14 प्रकार के दिव्य रत्न निकले और अंत में हलाहल विष भी निकला। इस हलाहल विष को देखकर देवता और दानव सभी घबरा गए।

विष के प्रभाव से चारों और का वातावरण विषमय में होता जा रहा था। तब सभी देवी-देवता काफी घबरा गए। वे सभी सोच में पड़ गए। इस गहरे संकट में वे सभी ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मलोक में सभी भगवान ने ब्रह्माजी को विपदा सुनाई। ब्रह्म देव सभी देवताओं और दानवों को लेकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे। सभी की बात सुनकर भगवान विष्णु सोचने लगे कि यदि इस विष को ब्रह्मांड में रखें तो संपूर्ण ब्रह्मांड समाप्त हो जाएगा। अंत में वह भी कुछ कर नहीं पाए।

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तब वे स्वयं सभी को लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे और देवाधिदेव महादेव से प्रार्थना की। महादेव ध्यान में थे, सभी की प्रार्थना सुनकर वे अपने नेत्र खोले स्वयं ब्रह्मा-विष्णु को देखकर वह भगवान विष्णु को प्रणाम कर कैलाश आने का कारण पूछे। तब भगवान ब्रह्मा बोले, आप तो अंतर्यामी है प्रभु! आपसे कुछ छिपा हुआ नहीं है। तब शिवजी ध्यान द्वारा सब कुछ जान गए और स्वयं वहां से उठकर समुद्र के बीचो-बीच जहां से हलाहल विष निकला था, वहां प्रकट हो गए और दोनों हाथों से विष के प्याले को पकड़कर सब विष को पी गए।

शिव जी को जलाभिषेक करने की पौराणिक कथा

जब भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को पिया। उस समय विष का प्रभाव इतना गहरा था कि शिवजी जो तीनो लोक के स्वामी होते हुए भी भी विष के प्रभाव से डगमगाने लगे। उनके कंठ में विशाल जलन होने लगी। कंठ एकदम नीला पड़ गया और वह तब से नीलकंठ कहलाने लगे।

विष के प्रभाव को शांत करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, अग्नि, वरुण, पवन आदि देवताओं ने स्तुति कर चंद्र देव को उनकी मस्तक पर विराजमान होने को कहा। चंद्र देव अपनी संपूर्ण शीतलता के साथ शिव के मस्तक पर अर्धचंद्र आकृति लेकर विराजमान हो गए। फिर भी शिवजी का जलन शांत नहीं हुआ। फिर शेषनाग जो भगवान विष्णु के शैय्या हैं, स्वयं को उनके कंठ पर लटक गए परंतु शिवजी का जलन शांत नहीं हुआ। कंठ के साथ-साथ पूरा शरीर अग्नि के समान गर्म होने लगा। आखिरकार मां महामाया दुर्गा के सहयोग से सभी देवता पतित पावनी मां गंगा का शीतल जल शिवजी के मस्तक पर चढ़ाई। उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी, बस तभी से भोलेनाथ पर जल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।

सभी देवी-देवताओं के जल चढ़ाने मात्र से शिव जी के शरीर का ताप शांत हो गया। इस तरह हलाहल विष को पीकर शिवजी ने संपूर्ण ब्रह्मांड सहित पृथ्वी की रक्षा की। उसी दिन से सब शिवलिंग पर जलाभिषेक करते चले आ रहे हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेता युग में रावण वध से मुक्ति हेतु श्री राम अपने चारों भाइयों सहित देवघर बाबा बैद्यनाथ धाम जल चढ़ाने आए थे।

हर हर महादेव !

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